इस विषय पर बात करने से पहले हमें साफ तौर पर यह जान लेना चाहिए कि प्रतिरोध
का मतलब एक पीड़ित समुदाय के लिए जो हो सकता है वह सिनेमा के लिए नहीं है। हम
सब यह अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे सिनेमा का नब्बे फीसदी हिस्सा कमर्शियल
है। इसलिए बचे हुए दस प्रतिशत सिनेमा के प्रतिरोध में और कमर्शियल सिनेमा के
प्रतिरोध में एक बुनियादी फर्क है।
और वह फर्क ये है कि कुछ लोग किसी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ फिल्म रचते हैं
और वे सामाजिक विषमता या अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध के स्वर को फिल्म के
केंद्र में रखते हैं और कुछ लोग उसी विषमतापूर्ण और अन्यायपूर्ण स्थिति से
उत्पन्न स्थितियों का व्यावसायिक उपयोग करते हैं। उनके लिए प्रतिरोध भी एक रॉ
मटेरियल है जैसे सेक्स, हाईफैशन, कैबरे डांस, काररेस, फाइटिंग, एडवेंचर,
जुडो-कराते या देश-विदेश के खूबसूरत दृश्य।
मतलब ये कि वे किसी तरह की प्रतिबद्धता के कारण नहीं, अपने व्यावसायिक जरूरतों
के लिए प्रतिरोध को फिल्म में लाते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत ये है कि वे अपनी
एक ही फिल्म में जिस दर्शक से किसी अश्लील आइटमसांग में ताली बजवा लेते हैं
उसी दर्शक से तब भी ताली बजवा लेते हैं जब नायक किसी नकली और मनगढ़ंत घमासान
में अंधाधुंध घूँसे चलाकर अपना प्रतिरोध दर्ज करता है। यह प्रतिरोध हालाँकि
सिर्फ दिखावे का प्रतिरोध होता है लेकिन यह ''दिखावा'' इतना भव्य और
प्रभावपूर्ण होता है कि असली प्रतिरोध कहीं धूल-गुबार में खो जाता है।
हम सब यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि फिल्म माध्यम ज्यादातर उन लोगों के हाथों
में रहा है जो किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए नहीं सिर्फ मनोरंजन के लिए और
मनोरंजन के जरिए व्यवसाय के लिए फिल्मों का निर्माण करते हैं।
सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इस माध्यम का इस्तेमाल या तो
उपभोक्तावादी मूल्यों को बढ़ाने के लिए या जनता की सामाजिक चेतना को भ्रमित
करने के लिए होता रहा है। और शायद यही वजह है कि फिल्म बहुत कम समय तक सिर्फ
फिल्म रह पाई अपनी शुरुआत के कुछ ही वर्षों बाद उसके साथ एक और शब्द जुड़ गया
- उद्योग, और अब तो ''फिल्म उद्योग'' शब्द इतना प्रचलित हो गया है कि ''फिल्म
कला'' नाम का शब्द लोगों की जबान से उतर गया है।
किसी भी उद्योग का यह अटल नियम है कि उस उद्योग के जरिए जो भी उत्पादन हो और
उसकी चाहे जैसी गुणवत्ता हो पर उसका अधिक से अधिक लाभ उत्पादक को मिले।
हर देश में जहाँ निजी उद्योग होते हैं वहीं सार्वजनिक उपक्रम भी होते हैं।
फिल्मों के साथ भी ऐसा ही है अगर निजी पूँजी पर आधारित फिल्म के प्रोडक्शन
हाउस हैं तो शासकीय फिल्म विकास निगम भी। इन निगमों का स्वरूप आमतौर पर
व्यावसायिक नहीं होता लेकिन कुछ खास तरह के नियमों (जिसमें सबसे पहला नियम तो
यही है कि निगम द्वारा दी गई सहायता से बनाई जाने वाली फिल्म में व्यवस्था का
विरोध नहीं होना चाहिए) बँधे होने के कारण वहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं
होती। जाहिर है निगम से मिलने वाली खैरात सिर्फ वही फिल्मकार लेगा जो व्यवस्था
पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता। शायद यही वजह है कि इस तरह की फिल्मों को
खैराती सिनेमा कहा जाता है।
अब आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर कोई यथार्थवादी फिल्मकार अपनी बात अपने
माध्यम से कहना चाहे तो यह कितना कठिन है। अगर वह किसी तरह की कोई खैरात न
लेना चाहे तो फिल्म निर्माण के लिए पर्याप्त साधन जुटाना कितना मुश्किल है।
लेकिन यह भी एक सच है कि जहाँ चुनौतियाँ और मुश्किलें होती है वहीं कुछ कर
गुजरने का जज्बा भी होता है और शायद यही वजह है कि फिल्मों के इतिहास में जहाँ
मुख्यधारा का दिशाहीन सिनेमा है वहीं कुछ सार्थक रचने की कोशिशें भी समय-समय
पर होती रही है। इस बात के अनेक उदाहरण मौजूद है कि कब और कैसे और किन लोगों
ने धारा का रुख मोड़ने की कोशिश की लेकिन इस बात के उदाहरण कहीं नहीं है कि
फिल्मकारों, पटकथा लेखकों, अभिनेताओं ने मिलकर कभी कोई साझा प्रतिरोध का मंच
बनाया हो या उन्होंने आपसी ताल-मेल से कोई ऐसा माहौल खड़ा किया हो, जिसका कोई
स्थायी या समग्र प्रभाव पड़ा हो। लिहाजा सिने कला के वयस्क होने के बाद पिछले
सात-आठ दशकों में कुछ स्वतःस्फूर्त उभार तो आए लेकिन आगे की कोई रूपरेखा नहीं
होने के कारण वे कहीं पहुँच नहीं पाए। इन विगत उभारों का उल्लेख हम आगे
करेंगे। पहले अपने समकालीन परिदृश्य पर एक नजर डालते हैं।
ऐसा दिखाई दे रहा है इस माध्यम को लेकर एक नई जागृति आई है। देश के विभिन्न
प्रदेशों के छोटे-छोटे कस्बों से एक बेहद प्रखर, प्रतिभाशाली और जुझारू फिल्म
चेतना विकसित हुई है। इस प्रतिरोधी धारा के दो रूप हैं। एक फिल्म उद्योग के
अंदर विकसित हो रही है और दूसरी बाहर अपना घेरा बना रही है। एक तरफ वे लोग हैं
जो फिल्म उद्योग के अंदर जाकर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। मनोज बाजपेयी,
नवाजुद्दीन, इरफान खान, आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, स्वरा
भास्कर और कंगना रनावत ऐसे अभिनेता हैं, जो कस्बों से आए, पहले अंदर दाखिल
होने और अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने का संघर्ष किया फिर छोटे-छोटे रोल किए फिर
अपनी प्रतिभा के दम पर चरित्र नायक बने और अब उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के
कैमरे को दूसरी दिशा में मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया। यह कोई छोटी मोटी बात
नहीं है। उन्होंने परंपरा से चलती आ रही हीरो की इमेज को तोड़ा। वे हीरोइज्म
और स्टारडम के सामने एक चुनौती के रूप में उभरकर आए हैं और इस बार वे अकेले
नहीं हैं उनके साथ उन्हीं की तरह छोटे-छोटे कस्बों से आए निर्देशक भी हैं।
विशाल भारद्वाज, दिवाकर बैनर्जी, अविनाश दास, सुभाष कपूर ये ऐसे नाम है जो
फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में भी वही काम कर रहे हैं। यहाँ भी एक ऐसे
निर्देशन की शुरुआत हो चुकी है जो व्यावसायिक शर्तों से बँधा हुआ नहीं है। वे
एक ऐसा सिनेमा रचने में सफल हुए हैं जो प्रचलित सिनेमा से अलग है।
यह तो हो गई उन लोगों की बात जो उस तंत्र में घुसे, वहाँ जबरदस्त फाइट की और
उन्होंने वहाँ उपलब्ध साधनों का अपने औजार के रूप में इस्तेमाल किया। अब हम
उनकी बात करते हैं, जिन्होंने फिल्म बनाने के लिए उस तंत्र में जाना और उस
तंत्र द्वारा विकसित की गई प्रणाली को अपनाना जरूरी नहीं समझा।
जैसा कि हम पहले से देखते आ रहे हैं फिल्म बनाने के लिए हमारे पास सिर्फ दो
विकल्प थे - फिल्म इंडस्ट्रीज और फिल्म विकास निगम। लेकिन सत्तर के दशक में दो
और विकल्प सामने आए - क्राउड फंडिंग और वी.एच.एस. सिस्टम, जो बाद में वीडियो
के रूप में प्रचलित हुआ। कमर्शियल सिनेमा के लिए यह तकनीक फायदेमंद नहीं थी
क्योंकि इससे कई गुना ज्यादा प्रभावशाली मशीनें उनके पास पहले से मौजूद थी
लेकिन यह तकनीक उन लोगों के लिए बहुत ज्यादा कारगर साबित हुई जो फिल्में बनाना
चाहते थे लेकिन उसके व्यावसायिक प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि सामाजिक और
वैचारिक चेतना को आगे बढ़ाने के लिए।
श्याम बेनेगल की 'मंथन' पहली फिल्म थी जो क्राउड फंडिंग से बनी थी।
गुजरात-को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड से जुड़े पाँच लाख
किसानों ने दो-दो रुपये डोनेट किए थे। इसके बाद क्राउड फंडिंग के रूप में एक
नया विकल्प सामने आया। और भवनी भवाई, आइ एम, लंच बाक्स, हिंदी मीडियम और राम
के नाम पर जैसी फिल्में संभव हो सकी। ये फिल्में परंपरागत मूवी कैमरे से बनी
थी जिसमें वीडियो की तुलना में कई गुना ज्यादा लागत आती है। जन सहयोग की वजह
से इनका निर्माण संभव हो सका।
लेकिन वीडियो फार्मेट इतना सरल माध्यम है कि इस माध्यम से फिल्म बनाने के लिए
जनसहयोग की भी जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ ये महत्वपूर्ण है कि फिल्मकार का विजन
क्या है। और जिन फिल्मकारों के पास दृष्टि थी उन्होंने अपना काम भी कर बताया।
मसलन झारखंड और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों द्वारा अपनी जमीन पर थोपी गई सरकारी
परियोजनाओं के विरोध में बीजू टोप्पो ने एक फिल्म बनाई थी ''विकास बंदूक की
नाल से''। जिसमें विकास के नाम पर होने वाले विनाश का चित्रण है, उसके बाद
मदुरै के दलित सफाई कर्मियों के नारकीय जीवन के एक दिन को निर्देशक अमुधन
आर.पी. ने अपनी फिल्म पी (शिट) में शूट किया। वहीं पी. बाबूराव और सरतचंद्रन
ने अपनी फिल्म ''थाउजन डेज एंड अ ड्रीम'' में केरल के प्लाचीमुड़ा में
कोकाकोला के खिलाफ हुए जन प्रतिरोध को दर्ज किया गया। उत्तरपूर्वी भारत के
निर्देशक हाओबम पबन कुमार ने मणिपुर के काले कानून AFSPA 1958 के खिलाफ पूरे
राज्य में चले प्रतिरोध को अपनी फिल्म 'AFSPA 1958' में दर्ज किया। इसी तर्ज
पर संजय काक की फिल्म ''जश्ने आजादी'' है। जो कश्मीर में आजादी के मायने को
सामने लाती है। और निर्देशक इफ़्फत फातिमा की फिल्म ''वेअर हैव यू हिडन माई
न्यू क्रिस्सेंट मून'' भी कश्मीर की उन हजारों विधवाओं के दर्द को सामने लाती
है, जिसके पति या तो राजसत्ता या आतंकवाद के हाथों मारे गए। इस तरह की और भी
फिल्में हैं जो वीडियो फार्मेट पर काम करने वाले फिल्मकारों ने बनाई। ये ऐसे
अछूते विषय हैं, जिसको मुख्यधारा का कोई फिल्म निर्माता कभी छूना भी पसंद नहीं
करता।
बहरहाल, अब हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा के
बरक्स इस सिनेमा ने क्या सफलता हासिल की और इस तकनीक को अपनाए जाने के बाद
इतने वर्षों में इस सिनेमा ने सामाजिक चेतना को जाग्रत करने और लोगों को एक नई
दृष्टि से सोचने के लिए विवश करने में कितनी सफलता पाई। लेकिन इस मुद्दे पर
सोचने से पहले हमें यह सोचना पड़ेगा कि इन फिल्मों को प्रदर्शन के अवसर कितने
मिल पाए? जितना मुश्किल और जितना जरूरी इन फिल्मों का निर्माण था उतना ही
मुश्किल और उतना ही जरूरी उसका प्रदर्शन भी है। हम सब यह बात अच्छी तरह जानते
हैं कि फिल्म वितरण की प्रणाली भी निजी पूँजी पर आधारित है। तो फिर सवाल ये
बाकी रह जाएगा कि अगर ऐसी फिल्में प्रदर्शित नहीं हो पाएगी तो इन फिल्मों में
व्यक्त किए गए विचार कैसे लोगों तक पहुँचेंगे?
इन फिल्मों और दर्शकों के बीच जो खाई है उसे पाटने या उस पर कोई पुल बनाने की
जिम्मेदारी किसकी है? जाहिर है यह जिम्मेदारी उन संस्कृति कर्मियों की है जो
जन-सिनेमा को मुख्यधारा के सिनेमा के बरक्स खड़ा करना चाहते हैं। और ऐसा करने
के लिए अब उनके पास अवसर भी है। जिस तकनीक ने वीडियो के रूप में फिल्म निर्माण
का एक विकल्प दिया उसी तकनीक ने डिजिटल प्रोजेक्टर के रूप में फिल्म को
प्रदर्शित करने का एक आसान विकल्प भी उपलब्ध करवा दिया है। लिहाजा अब साधनों
की उपलब्धता को लेकर कोई बड़ी चुनौती नहीं है।
लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि छिट-पुट प्रयासों को छोड़कर कहीं कोई
व्यापक तैयारी नहीं हैं। और इसका कारण यह नहीं है कि जन सिनेमा के प्रति लोगों
में उदासीनता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लोगों में एकजुटता नहीं है।
हमारे बुद्धिजीवियों के पास बाकी सब कुछ है लेकिन बुद्धि नहीं है। उसके पास
विरोध और प्रतिरोध जैसे शब्द हैं लेकिन कोई रणनीति नहीं है। वे अपनी
प्रतिगामिता और गैर आधुनिक रवैये के कारण अपनी कोई रणनीति नहीं बना पाए। जबकि
साम्राज्यवादियों ने अपनी रणनीति का खाका तैयार करने के लिए फिल्म को भी
प्राथमिकता दी थी।
इसलिए यह बहुत जरूरी है कि प्रतिरोध करने के पहले अपनी रणनीति तै कर ली जाए और
अपनी रणनीति तै करने से पहले यह देख लेना जरूरी है कि हमारे शत्रु की रणनीति
क्या है, कि कमर्शियल सिनेमा के सिद्धांत कैसे गढ़े जा रहे हैं और कैसे हमारे
बुर्जुआ अपनी आर्थिक व्यवस्थाओं के लिए सांस्कृतिक आधार तैयार कर रहे हैं।
दरअसल कमर्शियल सिनेमा के निर्माता उन भारतीयों की जरूरतों से अपना लाभ उठा
रहे हैं, जो जरूरतें एक साथ आर्थिक भी है और मानसिक भी, वे उसके अभाव को अच्छी
तरह से समझ गए हैं। कठोर जातिवाद और दकियानूसी रीति-रिवाजों से जकड़े समाज में
खुलेपन और प्रेम की अभिव्यक्ति का अभाव और निजी मुनाफे पर आधारित अर्थव्यवस्था
में सामान्य जनों के लिए उनके श्रम के उचित मूल्य और रोजगार के उचित अवसरों का
अभाव। जो भी व्यक्ति चाहे जिस तरह के अभाव से ग्रस्त हो वह उससे उबरने के लिए
सिर्फ जी तोड़ मेहनत ही नहीं करता, वह अच्छे दिनों के और सुखद भविष्य के सपने
भी देखता है। कमर्शियल सिनेमा उसके संघर्षों और उसके सपनों को आपस में मिलाकर
एक ऐसा भ्रम रचता है जो वास्तविकता से भी ज्यादा असरदार होता है।
कमर्शियल सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत इस बात में निहित है कि वह दो धुर विरोधी
चीजों को आपस में मिलाकर उसकी असली पहचान मिटा देता है और उस चीज को भव्य बना
देता है चाहे वह धार्मिक अंधविश्वास हो या वैज्ञानिक खोज। चाहे वह हिंसा हो या
भय चाहे वह उत्पीड़न हो या पीड़ा, प्रेम हो या घृणा, दहेज, बलात्कार, शोषण,
गरीबी, बेकारी, भुखमरी हो या इन हालातों से उभरने वाला असंतोष या प्रतिरोध या
क्रांति ही क्यों न हो कमर्शियल सिनेमा की मशीन में जाकर तमाम चीजें अपना मूल
रूप खो देती है। कमर्शियल सिनेमा की मशीन को बनाया ही इस ढंग से गया है कि वह
माँग और पूर्ति के नियम के मुताबिक काम करे। इस मशीन में बाजार की जरूरतों के
हिसाब से सामान्य चीजों का विशिष्टीकरण और विशिष्ट चीजों का सामान्यीकरण करने
की अद्भुत क्षमता है। सिर्फ इतना ही नहीं वह इन चीजों के आंतरिक मनोवैज्ञानिक
घटकों और उससे जुड़े वस्तुगत तथ्यों को निकालकर बाहर कर देती है फिर बचे हुए
झूठे और तथ्यरहित माल को भव्य चाक्षुष रूप दिया जाता है। भले ही इस प्रक्रिया
में मनुष्य की हर भावना और सामाजिक मूल्यों को बाजार के आधार पर परखना पड़े।
उनका सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि उनकी मशीन से निकलने वाली चीज अपने पहले ही
प्रदर्शन से लोकप्रिय हो। जहाँ लोकप्रियता पहली शर्त होगी वहाँ लोकहितों की
बात करने का कोई अर्थ नहीं होता। वे जानते हैं कि कोई भी चीज तब तक लोकप्रिय
नहीं हो सकती जब तक वह मनोरंजक न हो। और मनोरंजन के लिए वे भारतीय
मध्यमवर्गियों की हीन ग्रंथियों को ध्यान में रखकर ऐसे तत्वों का इस्तेमाल
करते हैं, जो उनकी हीन भावनाओं को तृप्त करें। उनका सरोकार हीन भावनाओं से है
लोक भावनाओं से नहीं। जाहिर है यह मनोरंजन हमारे मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त
रखने के लिए नहीं, हमारे सोचने-समझने की ताकत को नियंत्रित करने के लिए तैयार
किया जाता है।
पापुलर मनोरंजन की इस नियंत्रणकारी शक्ति ने अब एक सांस्कृतिक माफिया का रूप
ले लिया है और उसका एक ही उद्देश्य है - आदमी को उसकी ऐतिहासिकता से काट देना
तथा किसी भी पारंपरिक तत्व को सामाजिक प्रक्रिया का प्रगतिशील विकल्प बनने से
रोक देना।
इन सब निराशाजनक स्थितियों के बावजूद सिनेमा की शुरुआत से लेकर अब तक बीच-बीच
में उम्मीदों की किरणें कब प्रकट हुई? और कैसे उसने सच्चाई पर रोशनी डाली?
हालाँकि बहुत बड़ी तादाद में नहीं लेकिन हर दौर में कुछ लोग ऐसे थे, जिन्होंने
सिनेमा को भारत में सामाजिक और आत्म अभिव्यक्ति के एक कलात्मक माध्यम में
परिवर्तित करने में अहम भूमिका निभाई।
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जब कई क्रांतिकारी नेता नजरबंद कर दिए गए और सरकार
का दमन चक्र तेज चलने लगा तब देश में सांस्कृतिक चेतना का एक युग आया। भारतीय
जन नाट्य संघ तथा इसी प्रकार की संस्थाओं ने आंदोलन शुरू किए, जिसका प्रभाव
सिनेमा पर पड़ा। न्यू थियेटर्स की हमराही उसी सांस्कृतिक चेतना की पहली
अभिव्यक्ति थी। वर्ग संघर्ष का इतना यथार्थवादी चित्रण इससे पहले किसी फिल्म
में नहीं हुआ था। उसके बाद तो जैसे आंदोलन ही शुरू हो गया। पी.सी. बरुआ, देवकी
बोस, व्ही शांताराम, गुरुदत्त और विमल राय जैसे फिल्मकारों ने आजादी के बाद के
आंदोलन की विद्रोही चेतना का अत्यंत रचनात्मक इस्तेमाल शुरु किया।
लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि यह विश्वसनीय सिनेमा अपना कोई विश्वसनीय आधार नहीं
बना पाया। जिन लोगों ने यह आंदोलन शुरू किया था उनके बीच संगठित तैयारियाँ
आपसी तालमेल और सामुदायिक भावना का अभाव था। बांबे टाकीज, न्यू थियेटर्स और
प्रभात स्टूडियो जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में काम करने वाले साथी अलग हो गए
और उन्होंने अलग स्टूडियो खोले। ये स्टूडियो थे जहाँ रचनात्मकता को किसी
व्यक्ति की निजी प्रतिभा के रूप में देखा जाने लगा और समग्रता की जगह विशेषता
को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा।
यही वजह है कि जो फिल्मकार पहले एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत यथार्थवादी
फिल्में बना रहे थे अब वे कला का उपयोग व्यक्तिगत निजी अभिव्यंजना के साधन के
रूप में करने लगे। और उनके साथ ही साथ वे अतिरिक्त आय के लिए अपना स्टूडियो भी
किराये से देने लगे।
तब उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि व्यक्तिगत अभिव्यंजनावाद से जो हीरोइज्म
पैदा होगा वह इस माध्यम के लिए कितना खतरनाक साबित होगा और गैर रचनात्मक और
धंधेबाज लोगों को स्टूडियो किराए से देना कितना भारी पड़ सकता है।
इस बदलाव से पहले भारतीय फिल्म निर्माताओं के स्टूडियो में कलाकार, निर्देशक,
लेखक और तमाम सहकर्मी वेतन पर काम करते थे और बहुत नियोजित ढंग से ऐसी फिल्में
तैयार करते थे कि जिनमें उच्चगुणवत्ता का छायांकन और उतना ही स्तरीय गीत-संगीत
और सामाजिक आधार वाली सार्थक कहानियाँ होती थी लेकिन स्वतंत्र निर्माताओं के
आने के बाद छायांकन के नाम पर ट्रिक फोटोग्राफी, गीत-संगीत के नाम पर भौंडे
नाच-गाने और कहानी के नाम पर ऊल-जलूल फार्मूले इस्तेमाल होने लगे। स्वतंत्र
निर्माताओं के आने के बाद वातावरण तेजी से बदलने लगा। वे किराए से स्टूडियो
लेकर कलाकारों को अधिक परिश्रम देकर खरीदने लगे। पृथ्वीराज कपूर ने फ्रीलांस
पद्धति की नींव डाली और देखते ही देखते सभी कलाकार अपने वैतनिक अनुबंधों को
तोड़कर फ्रीलांसर बन गए, शुरुआत में तो इन फ्रीलांसरों को बहुत लाभ हुआ लेकिन
उन्हें यह पता नहीं था कि वे बहुत जल्द यूज एंड थ्रो वाले सिस्टम के तहत
स्टूडियो से बाहर फेंक दिए जाएँगे। इस बदलाव से पहले वैतनिक अनुबंध में काम
करने वाले कलाकारों की आय हालाँकि सीमित थी लेकिन उन्हें सालों साल अपनी कला
को माँजने और निखारने के अवसर मिलते थे चाहे वह गायक हो संगीतकार हो अभिनेता
हो या कैमरामेन या साउंड रिकार्डिस्ट, वे लंबे समय तक अपनी कला और अपनी
आजीविका को लेकर निश्चिंत रहते थे लेकिन बाद में बड़े से बड़े गायक, गीतकार
संगीतकार और अभिनेता को यह डर सताने लगा कि यह नई व्यवस्था उसका इस्तेमाल करने
के बाद एक न एक दिन उन्हें स्टूडियो से बाहर फेंक देगी। इस नई व्यवस्था के
हाईलाइटेड फोकस में सिर्फ कुछ ही दिनों के लिए कोई कलाकार दिखाई देता है फिर
उसे गुमनामी की अँधेरी गर्त में धकेल दिया जाता है। हमारे देखते ही देखते
इन्हीं चंद सालों में एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली गायक और अभिनेता आए और कुछ
ही दिनों में न जाने कहाँ चले गए। और इसका कारण सिर्फ ये है कि जो लोग पैसा
लगा रहे हैं उन्हें सिर्फ कलाकारों की कला को कम से कम दाम में खरीदने और अधिक
से अधिक दाम में बेचना आता है वे कभी किसी कलाकार के भविष्य के बारे में नहीं
सोचते।
हम सब यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि पूँजी कभी अकेली नहीं आती वह अपने चरित्र
को भी अपने साथ लाती है। शुरुआत के कुछ वर्षों बाद फिल्म स्टूडियो में
स्वतंत्र निर्माताओं के जरिये जो पूँजी आई वह मुनाफाखोरों, जमाखोरों, तस्करों,
जुवारियों, सटोरियों और अपराध सरगनाओं की काली पूँजी थी। अपराधियों के इस समूह
ने स्टूडियो के भीतर भी एक कालाबाजार खड़ा कर दिया। यह कालाबाजार कई दशकों से
फलता फूलता रहा है और अब तो प्रोडक्शन हाउस की शक्ल में कार्पोरेट पूँजी भी
प्रवेश कर गई है। इन भयानक प्रतिगामी ताकतों से मुकाबला करना बहुत कठिन है।
खासतौर से इसलिए क्योंकि इसने रचनात्मक काम करने वालों को भयानक प्रतिस्पर्धा
में डाल दिया है। वे अपने निजी अस्तित्व को बचाने और अपनी कला को बचाने के एक
भयंकर द्वंद्व से गुजर रहे हैं।
अब यहाँ आकर हमें यह सोचने की जरुरत है कि फिल्म उद्योग से जुड़े और फिल्म
उद्योग से बाहर रहकर काम करने वाले समान विचारधारा वाले साथियों की सीमाओं और
उनकी विवशताओं को ध्यान में रखकर हम ऐसा कौन-सा विकल्प खड़ा कर सकते हैं, जो
प्रतिरोध के सिनेमा का आधार बन सके।
मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म माध्यम से जुड़े लोगों और सांस्कृतिकर्मियों,
विभिन्न कला मंचों, संस्थाओं और लेखक संगठनों को मिलकर यह प्रयास करना चाहिए।
अगर हम अपनी सांस्कृतिक नीतियों के फैलाव में सिनेमा की भूमिका को आगे नहीं
लाएंगे तो कभी कोई वैकल्पिक आधार खड़ा नहीं हो सकता।
इसलिए इस मामले में सैद्धांतिक रूप से क्या हो सकता है यह सोचने के बजाए सब को
यह सोचने की जरूरत है कि व्यावहारिक रूप से क्या हो सकता है। माध्यम से जुड़े
साथियों और संस्कृतिकर्म से जुड़े साथियों के बीच आपसी तालमेल का होना बहुत
जरूरी है। इसी तालमेल से एक ऐसी अंतर्क्रिया संभव हो सकती है जिसमें हम एक नई
सिने-भाषा की खोज कर सकें और सिनेमा तथा दर्शकों के बीच जीवंत संवाद कायम करने
के कर्तव्य निश्चित कर सकें। और यह समय एकजुट होने का बिल्कुल सही समय है।
क्योंकि हर तरह के ऊपरी दिखावे के बावजूद फिल्म उद्योग अपने ही अंर्तविरोधों
के कारण अंदर ही अंदर बौखला गया है। और इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि वह आय के
झूठे आँकड़े मीडिया में प्रकाशित करवा रहा है। अगर सबकुछ ठीक ठाक चल रहा होता
तो उसे यह प्रचारित करने की क्यों जरूरत पड़ती कि फलाँ फिल्म ने पचास करोड़ का
बिजनेस किया या फलाँ फिल्म का बजट तीस करोड़ का है। जबकि सच्चाई यह है कि छोटे
और स्वतंत्र सिनेमाघर खत्म होते जा रहे हैं और मल्टीफ्लेक्स में जाने वाले
उच्च मध्यम वर्गीय दर्शकों की संख्या भी लगातार कम हो रही है। कई बड़े
निर्माताओं की निर्माण कंपनियों ने लंबे अरसे से कोई फिल्म नहीं बनाई है।
दर्शकों की इस उदासीनता का कारण क्या है? एक कारण तो यह है कि वह अब फिल्म के
नाम पर सिर्फ स्पेशल इफेक्ट का हव्वा नहीं देखना चाहता। उसे उन विषयों की
जरूरत है जो विषय उसके जीवन से जुड़े हैं। दूसरा कारण यह है कि मल्टीफ्लेक्स
में कोका-कोला और पॉपकार्न के साथ फिल्म देखने का शगल भी अब खत्म हो रहा है।
आर्थिक मंदी ने उस भौंडे दर्शक की जेब खाली कर दी है, जो फिल्म देखने नहीं
अपने ब्रांडेड कपड़ों और जूतों का प्रदर्शन करने सिनेमाघर जाता था।
कुल मिलाकर ये सारी परिस्थितियाँ जन सिनेमा के विस्तार के लिए एक बड़ा आधार बन
सकती हैं और इसके लिए जरूरत सिर्फ जज्बे की है। किसी बड़ी धनराशि या साधनों की
नहीं।